मुझे हमेशा लगता था कि मेरी माँ मुझे सच में नहीं चाहती थी, जब मैं बच्ची थी, तो मैं यह महसूस कर सकती थी। बाकी बच्चों की माएँ थीं, जो उनके हाथ पकड़ती थीं, उनके साथ मुस्कुराती थीं। लेकिन मेरी माँ... वो मुझे शायद ही देखती थी, और जब देखती भी थी तो ऐसे जैसे मैं कोई और बच्ची हूँ, या कोई मेहमान जो गलती से यहां आ गया हो।
शुरुआत में तो मुझे ये सब समझ नहीं आया। लेकिन जैसे-जैसे मैं बड़ी हुई, मुझे एहसास होने लगा कि शायद मेरी माँ ने मुझे कभी चाहा ही नहीं। शायद वो गलती से प्रेग्नेंट हो गई थीं, या मेरी वजह से उनकी ज़िंदगी बिगड़ गई थी। उनकी आँखों में सिर्फ थकान और गुस्सा था, कभी भी प्यार नहीं दिखता था।
बाकी लोगों को भी लगता था कि मेरा जन्म एक गलती थी। मेरे पापा वैसे ही बिखरे हुए रहते थे और माँ के आस-पास के लोग भी हमेशा उसकी निंदा ही करते थे। "छोटी, बेकार, अनचाही" – बस यही सब सुनने को मिलता था। जैसे मैं किसी की गलती हूँ, कोई छोटी सी मुसीबत जो खत्म ही नहीं होती।
मुझे आज भी याद है, जब मैं छोटी थी, तो मेरी माँ फिर से प्रेग्नेंट हो गई थीं और मेरे छोटे भाई का जन्म हुआ। तब तो मुझे बिल्कुल लगने लगा कि मैं यहाँ किसी को भी चाहिए ही नहीं। मेरे पापा ने कभी प्यार नहीं दिखाया, न ही कभी गोद में उठाया या बात की। बस अपने आस-पास ठंडापन और उदासी ही महसूस होती थी।
मेरी माँ हमेशा बहुत थकी और निराश सी रहती थीं। मेरे पापा भी ऐसे ही थे। अब जब सोचती हूँ, तो लगता है कि उन दोनों में से कोई भी मुझे अपना नहीं मानता था। लोग भी कहते थे कि अगर मैं यहाँ न होती, तो सब ज्यादा खुश रहते।
हम एक छोटे से, पुराने से अपार्टमेंट में रहते थे। दीवारों पर दरारें थीं, हर जगह से पेंट उतर रहा था। रात में हर ओर अंधेरा होता था, सब बहुत सूना-सूना सा लगता था – जैसे कुछ भी ठीक नहीं है।
फिर भी, घर सिर्फ बाहर से ही सैफ लगता था, अंदर से तो सब कुछ बिखरा हुआ था, बस एक दरवाजा था जो हम दोनों को अलग करता था।
जैसे-जैसे मैं बड़ी हो रही थी, मैंने देखा कि घर में सामान जमा होता जा रहा था—वो चीजें मेज़ पर, काउंटर टॉप पर, हर जगह बिखरी पड़ी थीं, जैसे किसी ने उन्हें किसी ने सेव करके रखा हो।। मेरी माँ हमेशा कहती थीं - उन्हें रखो, इनकी ज़रूरत पड़ेगी।' और जब मैं पूछती थी कि इन सबका क्या करना है, तो वो गुस्से में कहती थीं, 'तुम्हें समझ नहीं आएगा, बस रहने दो!' शायद वे चीज़ें बस पुरानी यादें थीं, जिनसे वो छिप नहीं पा रही थीं, या फिर वो वक्त बस ऐसे ही गुजर रहा था, जिसे वो सिर्फ क्लॉक की तरह देख रही थी , वेट करती थी कि सब कुछ बदल जाएगा।
मुझे ये समझ नहीं आता था कि मैं एक बोझ हूँ, बस एक और पेट जो खाना खाएगा। मैं कुछ भी मदद नहीं कर पाती थी, बस चुपचाप रहती थी। कभी-कभी मुझे लगता था जैसे मैं बैकग्राउंड में म्यूजिक की तरह हु।, जिसकी किसी को कोई परवाह नहीं। मैं सोचती थी कि शायद मेरी माँ भी खुद को नहीं पहचानतीं, या फिर उनका प्यार कहीं खो चुका था।। उनका चेहरा सूना और थका हुआ लगता था, और उनकी आँखों में ज़िंदगी की जगह बस थकान दिखती थी।
मुझे याद है, मैं कोशिश करती थी कि उन्हें हँसा सकूं या खुश कर सकूं, लेकिन जितनी अधिक मैं कोशिश करती, उतनी ही वो मुझसे दूर होती जाती थीं। जैसे मैं उनका एक और बोझ हूँ। और फिर, जब मैं छोटी थी, एक रात मैंने माँ को किसी से कहते सुना—"ये सब मेरी गलती है, शायद इसे पैदा नहीं होना चाहिए था।" फिर उन्होंने कहा—"जितनी ज़्यादा चीज़ें होती जा रही हैं, उतना ही सब कुछ मुश्किल होता जा रहा है, सब कुछ बस और भी खराब हो रहा है।"
शायद मेरी माँ को कभी खुशी मिली ही नहीं, या वो बस मुझे बर्दाश्त कर रही थीं, या फिर उनकी खुद की ज़िंदगी ही इतनी मुश्किल थी। मैं बस चुपचाप सब सुन रही थी और सोच रही थी कि ये सब मेरे साथ ही क्यों हो रहा है।
वो पहले जैसी नहीं रही थी, लेकिन अब उनकी आँखों में साफ़ दिख रहा था कि उनका दिल बहुत भारी है।
अगले दिन सुबह, मेरी माँ ने मुझे मुश्किल से देखा । मुझे लगा वो कुछ अलग लग रही थी, थोड़ी ठंडी, जैसे उसने भीतर ही भीतर कोई फ़ैसला कर लिया हो और अब कुछ भी वापस नहीं हो सकता। उन्होंने मुझे एक नज़र देखा और आगे बढ़ गई, मानो उनका मन पहले ही बन चुका हो और अब उन्हें कुछ भी फर्क नहीं पड़ता। मैं चुपचाप खड़ी रही, सोच रही थी कि शायद ये सब एहसास जल्दी ही चली जाएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
कुछ दिन बाद, सुबह-सुबह वो मुझे अच्छे कपड़ों में तैयार कर रही थी। उन्होंने मुझे जल्दी से तैयार किया , बाल बनाए और मेरे कपड़े ठीक किए। तभी घंटी बजी, और एक अजनबी-सी औरत घर के अंदर आई। वो बहुत सख़्त लग रही थी, बाल अच्छे से बंधे हुए थे, चेहरा ठंडा और कठोर, लेकिन आँखों में कुछ अजीब-सा था। उसने मुझे देखा, फिर मेरी माँ से कुछ बातें कीं। मेरा दिल घबराने लगा था, लग रहा था जैसे कुछ बुरा होने वाला है।
फिर माँ मुझे उठाकर नीचे की बिल्डिंग में ले गई, बिना एक भी शब्द बोले। मुझे वो पल अब तक याद है – माँ का चेहरा, वो खुशबू – सिगरेट और परफ्यूम की मिली-जुली सुगंध – सब कुछ आज भी याद है। माँ मुझे एक छोटी-सी शांत-सी कमरे में ले गई। वहाँ पहले से एक और औरत बैठी थी। उसने मुझे देखा, फिर माँ की तरफ़ देखा, और फिर मुझे दोबारा देखा। उसके चेहरे के भाव मुझे बिल्कुल अच्छे नहीं लगे, मुझे अजीब और डरावना सा महसूस हुआ।
“यही है?” उस औरत ने ठंडी आवाज़ में पूछा, सीधा मेरी माँ को देखते हुए।
माँ ने बस सिर हिला दिया, कुछ नहीं बोली। फिर उसने मुझे धीरे से उस औरत की ओर भेज दिया। उस औरत ने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा, फिर अपने हैंडबैग से कुछ निकाला और माँ के हाथ में रख दिया।
“शुक्रिया,” वह औरत बोली, जैसे एक काम पूरा हुआ हो। फिर उसने तुरंत मुझे कसकर पकड़ लिया। माँ ने पीछे मुड़कर मुझे देखा भी नहीं, बस वहीं खड़ी रही, गहरे ख़यालों में खोई हुई।
जब ये सब हो रहा था, तो मुझे समझ नहीं आ रहा था, मैं बस चुपचाप वहाँ अकेली खड़ी थी, जैसे कोई पुरानी, अनचाही चीज़ हूँ जो अब हटा दी जाएगी।
मा ने मुझे देखा, मुझे लगा शायद वो अपना मन बदल लेंगी, मुझे उम्मीद थी कि वो मुझे रोक लेंगी या कुछ बोलेंगी। लेकिन उन्होंने मुझे आँखों से भी नहीं देखा। उन्होंने बस मुँह घुमा लिया, और बिना कुछ कहे आगे बढ़ गईं। उनके कदमों की आवाज़ उस सुकून भरे घर में गूंज रही थी, और लग रहा था जैसे हर चीज़ बदल गई हो।
उसने मुझे एक छोटे से कमरे में ले जाकर बंद कर दिया। कमरा ठंडा था, बंद और अजीब सा। दरवाज़े के पार से मुझे माँ की आवाज़ सुनाई दे रही थी, लेकिन अब मैं अकेली हो गई थी। मुझे लग रहा था जैसे सब कुछ एकदम से बदल गया हो। शायद मुझे समझ आ गया था कि अब मैं यहाँ पर रहूंगी।
अब मैं पहली बार अकेली थी, उस अँधेरे, ठंडे कमरे में। जैसे अब मुझे कोई नहीं चाहता। मैं चुपचाप बैठी रही, सोचती रही कि अब क्या होगा। बाहर से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी, बस एक सन्नाटा था, जैसे सब कुछ थम सा गया हो।
जारी।
जय श्री महाकाल।
आगे क्या होगा?


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